Important Hindi Note | Ras Hindi Grammar Quizzes (रस – हिंदी व्याकरण)

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Ras Hindi Grammar

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 ::: रस की परिभाषा :::

कविता, कहानी, या किसी नाटक इत्यादि को पढ़ते या देखते समय जो  भाव हमारे हृदय के अन्दर आते हैं उन्हें हिंदी  साहित्य में रस के नाम से जाना जाता है|

रस के प्रकार :- रस के ग्यारह भेद होते है- (1) शृंगार रस (2) हास्य रस (3) करूण रस (4) रौद्र रस (5) वीर रस (6) भयानक रस (7) बीभत्स रस (8) अदभुत रस (9) शान्त रस (10) वत्सल रस (11) भक्ति रस ।

रस स्थायी भाव उदाहरण
(1) शृंगार रस रति/प्रेम (i) संयोग शृंगार : बतरस लालच लाल की, मुरली धरी लुकाय।
(संभोग श्रृंगार): सौंह करे, भौंहनि हँसै, दैन कहै, नटि जाय। (बिहारी)
(ii) वियोग श्रृंगार : निसिदिन बरसत नयन हमारे
(विप्रलंभ श्रृंगार): सदा रहित पावस ऋतु हम पै जब ते स्याम सिधारे।।(सूरदास)
(2) हास्य रस हास तंबूरा ले मंच पर बैठे प्रेमप्रताप,
साज मिले पंद्रह मिनट, घंटा भर आलाप।
घंटा भर आलाप, राग में मारा गोता,
धीरे-धीरे खिसक चुके थे सारे श्रोता। (काका हाथरसी)
(3) करुण रस शोक सोक बिकल सब रोवहिं रानी।
रूपु सीलु बलु तेजु बखानी।।
करहिं विलाप अनेक प्रकारा।।
परिहिं भूमि तल बारहिं बारा।। (तुलसीदास)
(4) वीर रस उत्साह वीर तुम बढ़े चलो, धीर तुम बढ़े चलो।
सामने पहाड़ हो कि सिंह की दहाड़ हो।
तुम कभी रुको नहीं, तुम कभी झुको नहीं।। (द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी)
(5) रौद्र रस क्रोध श्रीकृष्ण के सुन वचन अर्जुन क्षोभ से जलने लगे।
सब शील अपना भूल कर करतल युगल मलने लगे।
संसार देखे अब हमारे शत्रु रण में मृत पड़े।
करते हुए यह घोषणा वे हो गए उठ कर खड़े।। (मैथिली शरण गुप्त)
(6) भयानक रस भय उधर गरजती सिंधु लहरियाँ कुटिल काल के जालों सी।
चली आ रहीं फेन उगलती फन फैलाये व्यालों-सी।। (जयशंकर प्रसाद)
(7) बीभत्स रस जुगुप्सा/घृणा सिर पर बैठ्यो काग आँख दोउ खात निकारत।
खींचत जीभहिं स्यार अतिहि आनंद उर धारत।।
गीध जांघि को खोदि-खोदि कै मांस उपारत।
स्वान आंगुरिन काटि-काटि कै खात विदारत।। (भारतेन्दु)
(8) अदभुत रस विस्मय/आश्चर्य आखिल भुवन चर-अचर सब, हरि मुख में लखि मातु।
चकित भई गद्गद् वचन, विकसित दृग पुलकातु।। (सेनापति)
(9) शांत रस शम/निर्वेद
(वैराग्य/वीतराग)
मन रे तन कागद का पुतला।
लागै बूँद बिनसि जाय छिन में, गरब करै क्या इतना।। (कबीर)
(10) वत्सल रस वात्सल्य रति किलकत कान्ह घुटरुवन आवत।
मनिमय कनक नंद के आंगन बिम्ब पकरिवे घावत।। (सूरदास)
(11) भक्ति रस भगवद विषयक
रति/अनुराग
राम जपु, राम जपु, राम जपु बावरे।
घोर भव नीर-निधि, नाम निज नाव रे।। (तुलसीदास)

 ::: रस के अंग :::

·• रस के चार अंग है जो की निम्नलिखित हैं –

  • विभाव :-

    • विभाव के भेद :- (क) आलंबन विभाव (ख) उद्दीपन विभाव
  • अनुभाव :-
    • कायिक
    • वाचिक
    • मानसिक
    • आहार्य
    • सात्विक
  • व्यभिचारी भाव :-
  • स्थायी भाव :-

विभाव, अनुभाव, व्यभिचारी स्थायी भाव भाव के संयोग से रस की निष्पत्ति होती है।

विभाव (Vibhav Ras)-
जो व्यक्ति, पदार्थ अथवा बाह्य विकार अन्य व्यक्ति के हृदय में भावों को जाग्रत् करते हैं, उन भावोद्बोधक अथवा रसाभिव्यक्ति के कारणों को विभाव कहते हैं। इनके आश्रय से रस प्रकट होता है, यह कारण निमित्त अथवा हेतु कहलाते हैं। ये विभाव आश्रय में भावों को जाग्रत भी करते हैं और उन्हें उद्दीप्त भी करते हैं। इस कारण इसके आलम्बन’ तथा उद्दीपन नामक दो भेद किये गये हैं

अनुभाव (Anubhav Ras)-
वाणी तथा अंग-संचालन आदि की जिन क्रियाओं से आलम्बन तथा उद्दीपन आदि के कारण आश्रय के हृदय में जाग्रत् भावों का साक्षात्कार होता है, वह व्यापार अनुभाव कहलाता है। इस रूप में वे विकाररूप तथा भावों के सूचक हैं ।भावों की सूचना देने के कारण वे भावों के अनु अर्थात् पश्चातवर्ती एवं कार्यरूप माने जाते हैं, इन्हीं अनुभावों के सहारे ही पात्र के भावों को जाना जाता है प्रत्येक रस के विचार से यह अनुभाव भी अलग अलग होते हैं । इनके कायिक, मानसिक, आहार्य, वाचिक एवं सात्त्विक नामक भेद किये गये हैं ।

व्यभिचारी भाव (Vyabhichari Bhav Ras)
इसे संचारी भाव के नाम से भी जाना जाता है । रस के सम्बन्ध में जो अन्य वस्तुओं की ओर संकेत करें उन्हें व्यभिचारी भाव माना गया है|
अथवा, जो भाव विशेष रूप से स्थायी भाव की पुष्टि के लिए तत्पर या अभिमुख रहते हैं और स्थायी भाव के अन्तर्गत आविर्भूत और तिरोहित होते दिखाई देते हैं, वे संचारी या व्यभिचारी भाव कहलाते हैं ।
जैसे—लहरें समुद्र में पैदा होती हैं और उसी में विलीन हो जाती हैं, वैसे ही रति आदि स्थायी भावों में निर्वेद आदि संचारी भाव (व्यभिचारी भाव) मुख्य रूप से स्थायी भात में ही उठते-गिरते हैं । लहरों के उठने-गिरने से समुद्र का समुद्रत्व और भी पुष्ट होता है, ठीक उसी तरह ‘व्यभिचारी (या संचारी) भाव’ स्थायी भावों के पोषक होते हैं । स्थायी भाव स्थिर हैं, तो व्यभिचारी (संचारी) भाव संचरणशील और अस्थिर

व्यभिचारी (संचारी) भावों के प्रकार-
1. निर्वेद, 2. आवेग, 3. दैन्य, 4. श्रम, 5. मद, 6. जड़ता, 7. औग्रय (उग्रता), 8. मोह, 9. विबोध, 10. स्वप्न 11. अपस्मार, 12. गर्व, 13. मरण, 14. अलसता, 15. अमर्ष, 16. निद्रा, 17. अवहित्था, 18 औत्सुक्य, 19. उन्माद, 20. शंका, 21. स्मृति, 22. मति, 23. व्याधि, 24. सन्त्रास, 25. लज्जा, 26. हर्ष, 27. असूया, 28. विषाद, 29. धृति, 30. चपलता, 31. ग्लानि, 32. चित्रा और 33. वितर्क

स्थायी भाव (Asthai Bhav Ras)-
काव्यचित्रित श्रृंगार आदि रसों के मूलभूत कारण स्थायी भाव हैं भावका अर्थव्याप्तिहोता है और भाव इसलिए भाव कहलाते हैं कि वचन, अंगभंगी एवं सात्त्विकों (स्तम्भ, स्वेद, रोमांच इत्यादि ) के अभिनय के द्वारा वे काव्यार्थ की भावना कराते हैं, कवि अपनी रचना को सामाजिक के रसास्वादन की वस्तु तभी बना सकता है, जब वह भावगर्भित हो, भाव की अनुपस्थिति में कवि एवं सामाजिक के बीच कोई मानसिक अन्त:करणीय सम्बन्ध स्थापित नहीं हो सकता

नोट: – 

(1) शृंगार रस को ‘रसराज/ रसपति’ कहा जाता है।
(2) नाटक में 8 ही रस माने जाते है क्योंकि वहां शांत को रस में नहीं गिना जाता। भरत मुनि ने रसों की संख्या 8 माना है।
(3) भरत मुनि ने केवल 8 रसों की चर्चा की है, पर आचार्य अभिन्नगुप्त (950-1020 ई०) ने ‘नवमोऽपि शान्तो रसः कहकर 9 रसों को काव्य में स्वीकार किया है।
(4) श्रृंगार रस के व्यापक दायरे में वत्सल रस व भक्ति रस आ जाते हैं इसलिए रसों की संख्या 9 ही मानना ज्यादा उपयुक्त है।

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